एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
Disclaimer
12 नवंबर 2025
11 नवंबर 2025
काल भैरव साधना
- शत्रु बाधा.
- तंत्र बाधा.
- इतर योनी से कष्ट.
- उग्र साधना में रक्षा हेतु.
- रात्रि कालीन साधना है.अमावस्या, नवरात्रि,कालभैरवाष्टमी, जन्माष्टमी या किसी भी अष्टमी से प्रारंभ करें.
- रात्रि 9 से 4 के बीच करें.
- काला आसन और वस्त्र रहेगा.
- रुद्राक्ष या काली हकिक माला से जाप करें.
- १०००,५०००,११०००,२१००० जितना आप कर सकते हैं उतना जाप करें.
- जाप के बाद १० वा हिस्सा यानि ११००० जाप करेंगे तो ११०० बार मंत्र में स्वाहा लगाकर हवन कर लें.
- हवन सामान्य हवन सामग्री से भी कर सकते हैं.
- काली मिर्च या तिल का प्रयोग भी कर सकते हैं.
- अंत में एक कुत्ते को भरपेट भोजन करा दें. काला कुत्ता हो तो बेहतर.
- एक नारियल [पानीवाला] आखिरी दिन अपने सर से तीन बार घुमा लें, अपनी इच्छा उसके सामने बोल दें.
- किसी सुनसान जगह पर बने शिव या काली मंदिर में छोड़कर बिना पीछे मुड़े वापस आ जाएँ.
- घर में आकर स्नान कर लें.
- दो अगरबत्ती जलाकर शिव और शक्ति से कृपा की प्रार्थना करें.
- किसी भी प्रकार की गलती हो गयी हो तो उसके लिए क्षमा मांगे.
- दोनों अगरबत्ती घर के द्वार पर लगा दें.
10 नवंबर 2025
भैरव अष्टोत्तर शत नाम
- काला/लाल वस्त्र पहनें.
- दक्षिण दिशा की और मुख रखें .
- भैरव यंत्र या चित्र या पंचमुखी रुद्राक्ष रखकर कर सकते हैं .
- सरसों के तेल का दीपक जला सकते हैं .
- हर मन्त्र के साथ सिंदूर या लाल पुष्प चढ़ाएं .
01) ॐ भैरवाय नम:
02) ॐ भूतनाथाय नम:
03) ॐ भूतात्मने नम:
04) ॐ भूतभावनाय नम:
05) ॐ क्षेत्रदाय नम:
06) ॐ क्षेत्रपालाय नम:
07) ॐ क्षेत्रज्ञाय नम:
08) ॐ क्षत्रियाय नम:
09) ॐ विराजे नम:
10) ॐ श्मशानवासिने नम:
11) ॐ मांसाशिने नम:
12) ॐ खर्पराशिने नम:
13) ॐ स्मरांतकाय नम:
14) ॐ रक्तपाय नम:
15) ॐ पानपाय नम:
16) ॐ सिद्धाय नम:
17) ॐ सिद्धिदाय नम:
18) ॐ सिद्धसेविताय नम:
19) ॐ कंकालाय नम:
20) ॐ कालशमनाय नम:
21) ॐ कलाकाष्ठाय नम:
22) ॐ तनये नम:
23) ॐ कवये नम:
24) ॐ त्रिनेत्राय नम:
25) ॐ बहुनेत्राय नम:
26) ॐ पिंगललोचनाय नम:
27) ॐ शूलपाणये नम:
28) ॐ खडगपाणये नम:
29) ॐ कंकालिने नम:
30) ॐ धूम्रलोचनाय नम:
31) ॐ अभीरवे नम:
32) ॐ भैरवीनाथाय नम:
33) ॐ भूतपाय नम:
34) ॐ योगिनीपतये नम:
35) ॐ धनदाय नम:
36) ॐ अधनहारिणे नम:
37) ॐ धनवते नम:
38) ॐ प्रीतिवर्धनाय नम:
39) ॐ नागहाराय नम:
40) ॐ नागपाशाय नम:
41) ॐ व्योमकेशाय नम:
42) ॐ कपालभृते नम:
43) ॐ कालाय नम:
44) ॐ कपालमालिने नम:
45) ॐ कमनीयाय नम:
46) ॐ कलानिधये नम:
47) ॐ त्रिनेत्राय नम:
48) ॐ ज्वलन्नेत्राय नम:
49) ॐ त्रिशिखिने नम:
50) ॐ त्रिलोकपालाय नम:
51) ॐ त्रिवृत्ततनयाय नम:
52) ॐ डिंभाय नम:
53) ॐ शांताय नम:
54) ॐ शांतजनप्रियाय नम:
55) ॐ बटुकाय नम:
56) ॐ बटुवेशाय नम:
57) ॐ खट्वांगधराय नम:
58) ॐ भूताध्यक्षाय नम:
59) ॐ पशुपतये नम:
60) ॐ भिक्षकाय नम:
61) ॐ परिचारकाय नम:
62) ॐ धूर्ताय नम:
63) ॐ दिगंबराय नम:
64) ॐ शूराय नम:
65) ॐ हरिणे नम:
66) ॐ पांडुलोचनाय नम:
67) ॐ प्रशांताय नम:
68) ॐ शांतिदाय नम:
69) ॐ शुद्धाय नम:
70) ॐ शंकरप्रियबांधवाय नम:
71) ॐ अष्टमूर्तये नम:
72) ॐ निधीशाय नम:
73) ॐ ज्ञानचक्षुषे नम:
74) ॐ तपोमयाय नम:
75) ॐ अष्टाधाराय नम:
76) ॐ षडाधाराय नम:
77) ॐ सर्पयुक्ताय नम:
78) ॐ शिखिसखाय नम:
79) ॐ भूधराय नम:
80) ॐ भूधराधीशाय नम:
81) ॐ भूपतये नम:
82) ॐ भूधरात्मजाय नम:
83) ॐ कपालधारिणे नम:
84) ॐ मुंडिने नम:
85) ॐ नागयज्ञोपवीतवते नम:
86) ॐ जृंभणाय नम:
87) ॐ मोहनाय नम:
88) ॐ स्तंभिने नम:
89) ॐ मारणाय नम:
90) ॐ क्षोभणाय नम:
91) ॐ शुद्धनीलांजनप्रख्याय नम:
92) ॐ दैत्यघ्ने नम:
93) ॐ मुंडभूषिताय नम:
94) ॐ बलिभुजे नम:
95) ॐ बलिभुंगनाथाय नम:
96) ॐ बालाय नम:
97) ॐ बालपराक्रमाय नम:
98) ॐ सर्वापत्तारणाय नम:
99) ॐ दुर्गाय नम:
100) ॐ दुष्टभूतनिषेविताय नम:
101) ॐ कामिने नम:
102) ॐ कलानिधये नम:
103) ॐ कांताय नम:
104) ॐ कामिनीवशकृद्वशिने नम:
105) ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम:
106) ॐ वैद्याय नम:
107) ॐ प्रभवे नम:
108) ॐ विष्णवे नम:
9 नवंबर 2025
भैरवं नमामि
सं सं सं संहार मूर्ति शुभ मुकुट जटा शेखरं चन्द्र विम्बं
दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुख चौर्ध्व रोमं करालं
पं पं पं पाप नाशं प्रणमतं सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ १ ॥
रं रं रं रक्तवर्णं कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्रा विशालं
घं घं घं घोर घोषं घ घ घ घ घर्घरा घोर नादं
कं कं कं कालरूपं धग धग धगितं ज्वलितं कामदेहं
दं दं दं दिव्य देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ २ ॥
लं लं लं लम्ब दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वाकरालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुट विकृत मुखंमासुरं भीम रूपं
रूं रूं रूं रुण्डमालं रुधिरमय मुखं ताम्र नेत्रं विशालं
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ३ ॥
वं वं वं वायुवेगं प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपं
खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवन निलयं भास्करं भीमरूपं
चं चं चं चालयन्तं चल चल चलितं चालितं भूत चक्रं
मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ४ ॥
खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालान्धकारं
क्षि क्षि क्षि क्षिप्र वेग दह दह दहन नेत्रं सन्दीप्यमानं
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन गर्जितं भूमिकंपं
बं बं बं बाललीलम प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ५ ॥
- भैरव प्रार्थना है.
- उनकी कृपा प्रदान करती है .
8 नवंबर 2025
रक्षा कारक भैरव् यंत्र !
रक्षा कारक भैरव् यंत्र !
नकारात्मक शक्तियों से परेशान हैं ?
घर/दुकान पर तंत्र प्रयोग का संदेह है ?
तो आपको रक्षा प्रयोग करना चाहिए ....
रक्षा कारक देवताओं में भगवान भैरव को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है । इन्हें भगवान शिव का ही एक स्वरूप माना गया है । प्रत्येक पूजन में विघ्नों से रक्षा के लिए भगवान गणेश की पूजा के पश्चात सर्व विध रक्षा के लिए भगवान श्री भैरव का पूजन संपन्न किया जाता है . प्रमुख रूप से आठ प्रकार के भैरव माने गए हैं । कई तांत्रिक ग्रन्थों में 51 और 64 प्रकार के भैरव का भी उल्लेख मिलता है ।
यूट्यूब पर उपलब्ध विडियोस मे आप पाएंगे कि गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी ने अपने प्रवचनों में कई बार भैरव साधना के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियां दी है उनमें से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि भैरव यंत्र का पूजन करके अगर आप उसे घर के प्रमुख द्वार के ऊपर लटका दें तो नकारात्मक शक्तियों का घर के अंदर प्रवेश नहीं हो पाता है ।.
आपके नाम से भैरव यंत्र [शुल्क- पाँच सौ एक रुपये मात्र] अभिमंत्रित करके आपको स्पीड पोस्ट से भेजने की व्यवस्था हमारे प्रतिष्ठान " अष्टलक्ष्मी पूजा सामग्री" की तरफ से की जा सकती है, इसके लिए आप इस क्यूआर कोड़ का उपयोग भी कर सकते हैं :-
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7 नवंबर 2025
काल भैरव अष्टकम
काल भैरव अष्टकम
देवराज सेव्यमान पावनांघ्रि पङ्कजं व्याल यज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम् ।
नारदादि योगिवृन्द वन्दितं दिगंबरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ १॥
जिनके चरण कमलों की पूजा देवराज इन्द्र द्वारा की जाती है; जिन्होंने सर्प को एक यज्ञोपवीत के रूप में धारण किया है, जिनके ललाट पर चन्द्रमा शोभायमान है और जो अति करुणामयी हैं; जिनकी स्तुति देवों के मुनि नारद और सभी योगियों द्वारा की जाती है; जो दिगंबर रूप में रहते हैं, ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भानुकोटि भास्वरं भवाब्धि तारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थ दायकं त्रिलोचनम् ।
काल कालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ २॥
जिनकी आभा कोटि सूर्यों के प्रकाश के समान है, जो अपने भक्तों को जन्म मृत्यु के चक्र से रक्षा करते हैं, और जो सबसे महान हैं ; जिनका कंठ नीला है, जो हमारी इच्छाओं और आशाओं को पूरा करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं; जो स्वयं काल के लिए भी काल हैं और जिनके नयन पंकज के पुष्प जैसे हैं; जिनके हाथ में त्रिशूल है; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
शूलटंक पाशदण्ड पाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्र ताण्डवप्रियं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ३॥
जिनके हाथों में त्रिशूल, कुल्हाड़ी, पाश और दंड धारण किए हैं; जिनका शरीर श्याम है, जो स्वयं आदिदेव हैं और अविनाशी हैं और सांसारिक दुःखों से परे हैं; जो सर्वशक्तिमान हैं, और विचित्र तांडव उनका प्रिय नृत्य है; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भुक्ति मुक्तिदायकं प्रशस्त चारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्त लोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञ हेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ ४॥
जो अपने भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति और मुक्ति, दोनों प्रदान करते हैं और जिनका रूप मनमोहक है; जो अपने भक्तों से सदा प्रेम करते हैं और समूचे ब्रह्मांड में, तीनों लोकों में में स्थित हैं; जिनकी कमर पर सोने की घंटियाँ बंधी हुई है और जब भगवान चलते हैं तो उनमें से सुरीले सुर निकलते हैं, ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
धर्मसेतु पालकं त्वधर्म मार्गनाशनं कर्मपाश मोचकं सुशर्म धायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्ण शेषपाश शोभितांग मण्डलं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ५॥
काशी नगर के स्वामी, भगवान कालभैरव, जो सदैव धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करते हैं, जो हमें कर्मों के बंधन से मुक्त करके हमारी आत्माओं को मुक्त करते हैं; और जो अपने तन पर सुनहरे रंग के सर्प लपेटे हुए हैं; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
रत्नपादुका प्रभाभिरामपाद युग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्ट दैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्प नाशनं कराल दंष्ट्रमोक्षणं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ६॥
जिनके दोनों पैरों में रत्नजड़ित पादुकायें हैं; जो शाश्वत्, अद्वैत इष्ट देव हैं और हमारी कामनाओं को पूरा करते हैं; जो मृत्यु के देवता, यम का दर्प नष्ट करने मे सक्षम हैं, जिनके भयानक दाँत हमारे लिए मुक्तिदाता हैं; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धि दायकं कपालमालिका धरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ७॥
जिनके हास्य की प्रचंड ध्वनि कमल जनित ब्रह्मा जी द्वारा रचित सृष्टियों को नष्ट कर देती हैं, अर्थात् हमारे मन की भ्रांतियों को दूर करती है; जिनके एक दृष्टिपात मात्र से हमारे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं; जो अष्टसिद्धि के दाता हैं और जो खोपड़ियों से बनी माला धारण किए हुए हैं, काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भूतसंघ नायकं विशाल कीर्तिदायकं काशिवास लोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्ग कोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ८॥
जो भूतों के संघ के नायक हैं, जो अद्भुत कीर्ति प्रदान करते हैं; जो काशी की प्रजा को उनके पापों और पुण्य दोनों से मुक्त करते हैं; जो हमें नीति और सत्य का मार्ग दिखाते हैं और जो ब्रह्मांड के आदिदेव हैं, ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञान मुक्तिसाधनं विचित्र पुण्य वर्धनम्।
शोक मोह दैन्य लोभ कोप तापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम्॥९॥
यह अतिसुंदर काल भैरव अष्टक, जो ज्ञान तथा मुक्ति का स्रोत है, जो व्यक्ति में सत्य और नीति के आदर्शों को स्थापित करने वाला है, जो दुःख, राग, निर्धनता, लोभ, क्रोध, और ताप को नाश करने वाला है । इस स्तोत्र का जो पाठ करता है वह भगवान कालभैरव अर्थात् शिव चरणों को प्राप्त करता है ।
विधि :-
भगवान काल भैरव के इस अष्टक का नित्य 11 पाठ 11 दिन करें ।
सामने सरसों के तेल का दीपक जलाकर जाप करेंगे ।
काले रंग का वस्त्र और आसन पहनकर बैठें ।
27 जुलाई 2025
काल भैरव अष्टकम अर्थ सहित
काल
भैरव अष्टकम
देवराज
सेव्यमान पावनांघ्रि पङ्कजं व्याल यज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम् ।
नारदादि
योगिवृन्द वन्दितं दिगंबरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ १॥
जिनके चरण
कमलों की पूजा देवराज इन्द्र द्वारा की जाती है; जिन्होंने
सर्प को एक यज्ञोपवीत के रूप में धारण किया है, जिनके ललाट
पर चन्द्रमा शोभायमान है और जो अति करुणामयी हैं; जिनकी
स्तुति देवों के मुनि नारद और सभी योगियों द्वारा की जाती है; जो दिगंबर रूप में रहते हैं, ऐसे काशी नगरी के
अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भानुकोटि
भास्वरं भवाब्धि तारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थ दायकं त्रिलोचनम् ।
काल
कालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ २॥
जिनकी आभा कोटि
सूर्यों के प्रकाश के समान है, जो अपने भक्तों को जन्म मृत्यु
के चक्र से रक्षा करते हैं, और जो सबसे महान हैं ; जिनका कंठ नीला है, जो हमारी इच्छाओं और आशाओं को
पूरा करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं; जो स्वयं काल के लिए
भी काल हैं और जिनके नयन पंकज के पुष्प जैसे हैं; जिनके हाथ
में त्रिशूल है; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
शूलटंक
पाशदण्ड पाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं
प्रभुं विचित्र ताण्डवप्रियं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ३॥
जिनके
हाथों में त्रिशूल, कुल्हाड़ी, पाश और दंड धारण
किए हैं; जिनका शरीर श्याम है, जो
स्वयं आदिदेव हैं और अविनाशी हैं और सांसारिक दुःखों से परे हैं; जो सर्वशक्तिमान हैं, और विचित्र तांडव उनका प्रिय
नृत्य है; ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान
कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भुक्ति
मुक्तिदायकं प्रशस्त चारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्त लोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञ
हेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ ४॥
जो अपने
भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति और मुक्ति, दोनों प्रदान करते
हैं और जिनका रूप मनमोहक है; जो अपने भक्तों से सदा प्रेम
करते हैं और समूचे ब्रह्मांड में, तीनों लोकों में में स्थित
हैं; जिनकी कमर पर सोने की घंटियाँ बंधी हुई है और जब भगवान
चलते हैं तो उनमें से सुरीले सुर निकलते हैं, ऐसे काशी नगरी
के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
धर्मसेतु
पालकं त्वधर्म मार्गनाशनं कर्मपाश मोचकं सुशर्म धायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्ण
शेषपाश शोभितांग मण्डलं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ५॥
काशी नगर
के स्वामी, भगवान कालभैरव, जो सदैव धर्म
की रक्षा और अधर्म का नाश करते हैं, जो हमें कर्मों के बंधन
से मुक्त करके हमारी आत्माओं को मुक्त करते हैं; और जो अपने
तन पर सुनहरे रंग के सर्प लपेटे हुए हैं; ऐसे काशी नगरी के
अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
रत्नपादुका
प्रभाभिरामपाद युग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्ट दैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्प
नाशनं कराल दंष्ट्रमोक्षणं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ६॥
जिनके
दोनों पैरों में रत्नजड़ित पादुकायें हैं; जो शाश्वत्,
अद्वैत इष्ट देव हैं और हमारी कामनाओं को पूरा करते हैं; जो मृत्यु के देवता, यम का दर्प नष्ट करने मे सक्षम हैं,
जिनके भयानक दाँत हमारे लिए मुक्तिदाता हैं; ऐसे
काशी नगरी के अधिपति, भगवान कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं
दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धि
दायकं कपालमालिका धरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ७॥
जिनके
हास्य की प्रचंड ध्वनि कमल जनित ब्रह्मा जी द्वारा रचित सृष्टियों को नष्ट कर देती
हैं, अर्थात् हमारे मन की भ्रांतियों को दूर करती है;
जिनके एक दृष्टिपात मात्र से हमारे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं;
जो अष्टसिद्धि के दाता हैं और जो खोपड़ियों से बनी माला धारण किए
हुए हैं, काशी नगरी के अधिपति, भगवान
कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
भूतसंघ
नायकं विशाल कीर्तिदायकं काशिवास लोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्ग
कोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ८॥
जो भूतों के
संघ के नायक हैं, जो अद्भुत कीर्ति प्रदान करते हैं; जो काशी की प्रजा को उनके पापों और पुण्य दोनों से मुक्त करते हैं;
जो हमें नीति और सत्य का मार्ग दिखाते हैं और जो ब्रह्मांड के
आदिदेव हैं, ऐसे काशी नगरी के अधिपति, भगवान
कालभैरव को मैं नमन करता हूँ।
कालभैरवाष्टकं
पठंति ये मनोहरं ज्ञान मुक्तिसाधनं विचित्र पुण्य वर्धनम्।
शोक
मोह दैन्य लोभ कोप तापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम्॥९॥
यह अतिसुंदर
काल भैरव अष्टक, जो ज्ञान तथा मुक्ति का स्रोत है, जो व्यक्ति में सत्य और नीति के आदर्शों को स्थापित करने वाला है, जो दुःख, राग, निर्धनता,
लोभ, क्रोध, और ताप को
नाश करने वाला है । इस स्तोत्र का जो पाठ करता है वह भगवान कालभैरव अर्थात् शिव
चरणों को प्राप्त करता है ।
21 नवंबर 2024
रक्षा कारक भैरव् यंत्र !
रक्षा कारक भैरव् यंत्र !
रक्षा कारक देवताओं में भगवान भैरव को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है । इन्हें भगवान शिव का ही एक स्वरूप माना गया है । प्रत्येक पूजन में विघ्नों से रक्षा के लिए भगवान गणेश की पूजा के पश्चात सर्व विध रक्षा के लिए भगवान श्री भैरव का पूजन संपन्न किया जाता है . प्रमुख रूप से आठ प्रकार के भैरव माने गए हैं । कई तांत्रिक ग्रन्थों में 51 और 64 प्रकार के भैरव का भी उल्लेख मिलता है ।
यूट्यूब पर उपलब्ध विडियोस मे आप पाएंगे कि गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी ने अपने प्रवचनों में कई बार भैरव साधना के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियां दी है उनमें से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि भैरव यंत्र का पूजन करके अगर आप उसे घर के प्रमुख द्वार के ऊपर लटका दें तो नकारात्मक शक्तियों का घर के अंदर प्रवेश नहीं हो पाता है ।.
आपके नाम से भैरव यंत्र [शुल्क- पाँच सौ एक रुपये मात्र] अभिमंत्रित करके आपको स्पीड पोस्ट से भेजने की व्यवस्था की जा सकती है, इसके लिए आप इस क्यूआर कोड़ का उपयोग भी कर सकते हैं :-
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18 नवंबर 2024
17 नवंबर 2024
भैरवं नमामि
सं सं सं संहार मूर्ति शुभ मुकुट जटा शेखरं चन्द्र विम्बं
दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुख चौर्ध्व रोमं करालं
पं पं पं पाप नाशं प्रणमतं सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ १ ॥
रं रं रं रक्तवर्णं कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्रा विशालं
घं घं घं घोर घोषं घ घ घ घ घर्घरा घोर नादं
कं कं कं कालरूपं धग धग धगितं ज्वलितं कामदेहं
दं दं दं दिव्य देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ २ ॥
लं लं लं लम्ब दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वाकरालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुट विकृत मुखंमासुरं भीम रूपं
रूं रूं रूं रुण्डमालं रुधिरमय मुखं ताम्र नेत्रं विशालं
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ३ ॥
वं वं वं वायुवेगं प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपं
खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवन निलयं भास्करं भीमरूपं
चं चं चं चालयन्तं चल चल चलितं चालितं भूत चक्रं
मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ४ ॥
खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालान्धकारं
क्षि क्षि क्षि क्षिप्र वेग दह दह दहन नेत्रं सन्दीप्यमानं
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन गर्जितं भूमिकंपं
बं बं बं बाललीलम प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ५ ॥
- भैरव प्रार्थना है.
- उनकी कृपा प्रदान करती है .
16 नवंबर 2024
भैरव अष्टोत्तर शत नाम
01) ॐ भैरवाय नम:
02) ॐ भूतनाथाय नम:
03) ॐ भूतात्मने नम:
04) ॐ भूतभावनाय नम:
05) ॐ क्षेत्रदाय नम:
06) ॐ क्षेत्रपालाय नम:
07) ॐ क्षेत्रज्ञाय नम:
08) ॐ क्षत्रियाय नम:
09) ॐ विराजे नम:
10) ॐ श्मशानवासिने नम:
11) ॐ मांसाशिने नम:
12) ॐ खर्पराशिने नम:
13) ॐ स्मरांतकाय नम:
14) ॐ रक्तपाय नम:
15) ॐ पानपाय नम:
16) ॐ सिद्धाय नम:
17) ॐ सिद्धिदाय नम:
18) ॐ सिद्धसेविताय नम:
19) ॐ कंकालाय नम:
20) ॐ कालशमनाय नम:
21) ॐ कलाकाष्ठाय नम:
22) ॐ तनये नम:
23) ॐ कवये नम:
24) ॐ त्रिनेत्राय नम:
25) ॐ बहुनेत्राय नम:
26) ॐ पिंगललोचनाय नम:
27) ॐ शूलपाणये नम:
28) ॐ खडगपाणये नम:
29) ॐ कंकालिने नम:
30) ॐ धूम्रलोचनाय नम:
31) ॐ अभीरवे नम:
32) ॐ भैरवीनाथाय नम:
33) ॐ भूतपाय नम:
34) ॐ योगिनीपतये नम:
35) ॐ धनदाय नम:
36) ॐ अधनहारिणे नम:
37) ॐ धनवते नम:
38) ॐ प्रीतिवर्धनाय नम:
39) ॐ नागहाराय नम:
40) ॐ नागपाशाय नम:
41) ॐ व्योमकेशाय नम:
42) ॐ कपालभृते नम:
43) ॐ कालाय नम:
44) ॐ कपालमालिने नम:
45) ॐ कमनीयाय नम:
46) ॐ कलानिधये नम:
47) ॐ त्रिनेत्राय नम:
48) ॐ ज्वलन्नेत्राय नम:
49) ॐ त्रिशिखिने नम:
50) ॐ त्रिलोकपालाय नम:
51) ॐ त्रिवृत्ततनयाय नम:
52) ॐ डिंभाय नम:
53) ॐ शांताय नम:
54) ॐ शांतजनप्रियाय नम:
55) ॐ बटुकाय नम:
56) ॐ बटुवेशाय नम:
57) ॐ खट्वांगधराय नम:
58) ॐ भूताध्यक्षाय नम:
59) ॐ पशुपतये नम:
60) ॐ भिक्षकाय नम:
61) ॐ परिचारकाय नम:
62) ॐ धूर्ताय नम:
63) ॐ दिगंबराय नम:
64) ॐ शूराय नम:
65) ॐ हरिणे नम:
66) ॐ पांडुलोचनाय नम:
67) ॐ प्रशांताय नम:
68) ॐ शांतिदाय नम:
69) ॐ शुद्धाय नम:
70) ॐ शंकरप्रियबांधवाय नम:
71) ॐ अष्टमूर्तये नम:
72) ॐ निधीशाय नम:
73) ॐ ज्ञानचक्षुषे नम:
74) ॐ तपोमयाय नम:
75) ॐ अष्टाधाराय नम:
76) ॐ षडाधाराय नम:
77) ॐ सर्पयुक्ताय नम:
78) ॐ शिखिसखाय नम:
79) ॐ भूधराय नम:
80) ॐ भूधराधीशाय नम:
81) ॐ भूपतये नम:
82) ॐ भूधरात्मजाय नम:
83) ॐ कपालधारिणे नम:
84) ॐ मुंडिने नम:
85) ॐ नागयज्ञोपवीतवते नम:
86) ॐ जृंभणाय नम:
87) ॐ मोहनाय नम:
88) ॐ स्तंभिने नम:
89) ॐ मारणाय नम:
90) ॐ क्षोभणाय नम:
91) ॐ शुद्धनीलांजनप्रख्याय नम:
92) ॐ दैत्यघ्ने नम:
93) ॐ मुंडभूषिताय नम:
94) ॐ बलिभुजे नम:
95) ॐ बलिभुंगनाथाय नम:
96) ॐ बालाय नम:
97) ॐ बालपराक्रमाय नम:
98) ॐ सर्वापत्तारणाय नम:
99) ॐ दुर्गाय नम:
100) ॐ दुष्टभूतनिषेविताय नम:
101) ॐ कामिने नम:
102) ॐ कलानिधये नम:
103) ॐ कांताय नम:
104) ॐ कामिनीवशकृद्वशिने नम:
105) ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम:
106) ॐ वैद्याय नम:
107) ॐ प्रभवे नम:
108) ॐ विष्णवे नम:
- काला/लाल वस्त्र पहनें.
- दक्षिण दिशा की और मुख रखें .
- भैरव यंत्र या चित्र या पंचमुखी रुद्राक्ष रखकर कर सकते हैं .
- सरसों के तेल का दीपक जला सकते हैं .
- हर मन्त्र के साथ सिंदूर या लाल पुष्प चढ़ाएं .
15 नवंबर 2024
काल भैरव साधना
- शत्रु बाधा.
- तंत्र बाधा.
- इतर योनी से कष्ट.
- उग्र साधना में रक्षा हेतु.
- रात्रि कालीन साधना है.अमावस्या, नवरात्रि,कालभैरवाष्टमी, जन्माष्टमी या किसी भी अष्टमी से प्रारंभ करें.
- रात्रि 9 से 4 के बीच करें.
- काला आसन और वस्त्र रहेगा.
- रुद्राक्ष या काली हकिक माला से जाप करें.
- १०००,५०००,११०००,२१००० जितना आप कर सकते हैं उतना जाप करें.
- जाप के बाद १० वा हिस्सा यानि ११००० जाप करेंगे तो ११०० बार मंत्र में स्वाहा लगाकर हवन कर लें.
- हवन सामान्य हवन सामग्री से भी कर सकते हैं.
- काली मिर्च या तिल का प्रयोग भी कर सकते हैं.
- अंत में एक कुत्ते को भरपेट भोजन करा दें. काला कुत्ता हो तो बेहतर.
- एक नारियल [पानीवाला] आखिरी दिन अपने सर से तीन बार घुमा लें, अपनी इच्छा उसके सामने बोल दें.
- किसी सुनसान जगह पर बने शिव या काली मंदिर में छोड़कर बिना पीछे मुड़े वापस आ जाएँ.
- घर में आकर स्नान कर लें.
- दो अगरबत्ती जलाकर शिव और शक्ति से कृपा की प्रार्थना करें.
- किसी भी प्रकार की गलती हो गयी हो तो उसके लिए क्षमा मांगे.
- दोनों अगरबत्ती घर के द्वार पर लगा दें.
14 नवंबर 2024
काल भैरव मंत्र प्रयोग
काल भैरव मंत्र प्रयोग
- सभी प्रकार की तंत्र बाधाओं के शमन मे उपयोगी है ।
- अमावस्या, कृष्ण पक्ष मे अष्टमी/ त्रयोदशी/चतुर्दशी या सावन माह की किसी भी रात्रि करें|
- अपने सामने एक सूखा नारियल , एक कपूर की डली , 11 लौंग, 11 इलायची, 1 डली लोबान या धुप रखें |
- सरसों के तेल का दीपक जलाएं |
- हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें | नारियल सामने रखें |
- दक्षिण दिशा कीओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जाप करें |
- अगले दिन जल प्रवाह करें ।
13 नवंबर 2024
काल भैरव अष्टकम
काल भैरव अष्टकम
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
विधि :-
कालाष्टमी/दीपावली/सूर्यग्रहण/अमावस्या के अवसर पर 108 पाठ करें ।
यह सभी प्रकार के पूजन के पूर्व रक्षा के लिए उपयोगी है।
विभिन्न प्रकार के रक्षा प्रयोगों मे किया जा सकता है ।
5 अप्रैल 2024
काल भैरव अष्टकम
काल भैरव अष्टकम
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
विधि :-
सूर्यग्रहण के अवसर पर 108 पाठ करें ।
यह सभी प्रकार के पूजन के पूर्व रक्षा के लिए उपयोगी है।
विभिन्न प्रकार के रक्षा प्रयोगों मे किया जा सकता है ।
4 दिसंबर 2023
काल भैरव मंत्र प्रयोग
काल भैरव मंत्र प्रयोग
- सभी प्रकार की तंत्र बाधाओं के शमन मे उपयोगी है ।
- अमावस्या, कृष्ण पक्ष मे अष्टमी/ त्रयोदशी/चतुर्दशी या सावन माह की किसी भी रात्रि करें|
- अपने सामने एक सूखा नारियल , एक कपूर की डली , 11 लौंग, 11 इलायची, 1 डली लोबान या धुप रखें |
- सरसों के तेल का दीपक जलाएं |
- हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें | नारियल सामने रखें |
- दक्षिण दिशा कीओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जाप करें |
- अगले दिन जल प्रवाह करें ।
काल भैरव अष्टकम
काल भैरव अष्टकम
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
विधि :-
भैरवष्टमी,अमावस्या या नवरात्रि मे 108 पाठ करें ।
यह सभी प्रकार के पूजन के पूर्व रक्षा के लिए उपयोगी है।
विभिन्न प्रकार के रक्षा प्रयोगों मे इसे किया जा सकता है ।
काल भैरव साधना
- शत्रु बाधा.
- तंत्र बाधा.
- इतर योनी से कष्ट.
- उग्र साधना में रक्षा हेतु.
- रात्रि कालीन साधना है.अमावस्या, नवरात्रि,कालभैरवाष्टमी, जन्माष्टमी या किसी भी अष्टमी से प्रारंभ करें.
- रात्रि 9 से 4 के बीच करें.
- काला आसन और वस्त्र रहेगा.
- रुद्राक्ष या काली हकिक माला से जाप करें.
- १०००,५०००,११०००,२१००० जितना आप कर सकते हैं उतना जाप करें.
- जाप के बाद १० वा हिस्सा यानि ११००० जाप करेंगे तो ११०० बार मंत्र में स्वाहा लगाकर हवन कर लें.
- हवन सामान्य हवन सामग्री से भी कर सकते हैं.
- काली मिर्च या तिल का प्रयोग भी कर सकते हैं.
- अंत में एक कुत्ते को भरपेट भोजन करा दें. काला कुत्ता हो तो बेहतर.
- एक नारियल [पानीवाला] आखिरी दिन अपने सर से तीन बार घुमा लें, अपनी इच्छा उसके सामने बोल दें.
- किसी सुनसान जगह पर बने शिव या काली मंदिर में छोड़कर बिना पीछे मुड़े वापस आ जाएँ.
- घर में आकर स्नान कर लें.
- दो अगरबत्ती जलाकर शिव और शक्ति से कृपा की प्रार्थना करें.
- किसी भी प्रकार की गलती हो गयी हो तो उसके लिए क्षमा मांगे.
- दोनों अगरबत्ती घर के द्वार पर लगा दें.








